एक निबंध · जन स्वास्थ्य

जिस खामोशी को हम ठीक होना समझते हैं.

मानसिक बीमारी पर बात करने से इनकार करना हिम्मत नहीं है. यह संस्कृति के वेश में एक धीमी, शालीन हिंसा है — जो पीढ़ियों से चली आ रही है.

विषय भारत में मानसिक स्वास्थ्य
रूप दीर्घ निबंध
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भारत एक अजीब सी खामोशी की पूजा करता है. जो बाप अपने अवसाद के बारे में कभी नहीं बोलता, उसकी खामोशी को हम दवा समझ लेते हैं. जो माँ तीन घंटे की नींद में घर चलाती है, उसे हम "मजबूत" कहते हैं. परीक्षा के बाद टूटने वाले विद्यार्थी को हम "समर्पित" तब तक बताते रहते हैं, जब तक वह टूटना स्थायी नहीं हो जाता.

खामोशी को ताकत कहना कुछ भी ठीक नहीं करता. बस बीमार को चुप रखता है, और एक चुप बीमार इंसान बाहर से ठीक इंसान जैसा दिखता है. यह वही दाव है जो देश सदी भर से अपने साथ खेल रहा है.

मजबूत परिवार का भ्रम.

ज़्यादातर भारतीय परिवार मानसिक बीमारी से वैसे ही पेश आते हैं, जैसे कभी क्षय रोग से आते थे. शर्मनाक. छिपाने वाली. "उन" लोगों में होने वाली, हममें नहीं — खास तौर पर IIT की तैयारी करने वाले बेटे में नहीं, या अगले साल शादी होने वाली बेटी में नहीं. लखनऊ की चाय की दुकान पर, जयपुर के परिवार में, या पटना के संयुक्त परिवार में — हर जगह यही स्क्रिप्ट दोहराई जाती है: "पड़ोसी क्या सोचेगा."

इंसान को यह सिखाने वाला पहला घर होता है कि उसका दर्द शर्म की बात है, और मदद माँगने की जगह भी आखिरी वही घर होता है.[1] निमहंस के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में पाया गया कि भारत में निदान योग्य मानसिक स्वास्थ्य स्थिति वाले ८०% से अधिक लोगों को कोई उपचार नहीं मिलता. इसलिए नहीं कि उपचार मौजूद नहीं हैं. इसलिए कि परिवार देखना नहीं चाहते.

८०%
निदान योग्य मानसिक बीमारी वाले भारतीयों को कोई उपचार नहीं मिलता. किसी भी बड़ी बीमारी के लिए दुनिया में सबसे बड़ा उपचार-अंतर.
NIMHANS · राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16
परिवार क्या कहते हैं
  • ये बस एक दौर है, बड़ी होकर ठीक हो जाएगी
  • इसके पास सब कुछ है, उदास होने लायक क्या है
  • इलाज पागलों और अंग्रेज़ों के लिए होता है
  • इसे मंदिर ले जाओ, डॉक्टर के पास नहीं
  • रिश्तेदार क्या कहेंगे
वास्तव में क्या हो रहा है
  • अवसाद एक मूड नहीं, एक दीर्घकालिक स्थिति है
  • आत्महत्या का सबसे अधिक जोखिम "सब कुछ पाने वालों" में ही होता है
  • इलाज साक्ष्य-आधारित चिकित्सा है, पश्चिम का आयात नहीं
  • सिरोटोनिन की कमी प्रार्थना से पूरी नहीं होती
  • इस देश में रोकी जा सकने वाली मौतों का पहला कारण संकोच है

चुप भारतीय सुखी नहीं होता. चुप भारतीय को बीमार होने की जोर से बोलने की इजाज़त ही नहीं दी गई है.

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उपचार की खाई.

जब भारतीय परिवार आखिरकार मान लेता है कि कुछ गड़बड़ है, तब भी अक्सर जाने को जगह नहीं होती. देश में हर १,००,००० लोगों पर लगभग ०.७५ मनोचिकित्सक हैं.[2] विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश कम से कम तीन है. सबसे अधिक आत्महत्या दर वाले राज्य — सिक्किम, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ — में विशेषज्ञ सबसे कम हैं. बिहार के किसी ज़िले में शायद एक मनोचिकित्सक हो, वह भी महीने में दो बार. मध्य प्रदेश के आदिवासी ब्लॉक में यह संख्या शून्य के करीब है.

भूगोल ही पहला निदान है. मदत दूसरे शहर में है, तो मदत मौजूद नहीं है. दूसरा निदान पैसों का है. टियर-१ शहर में एक निजी मनोचिकित्सक परामर्श १,५०० से ४,००० रुपये में मिलता है. संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT) का पूरा कोर्स कई परिवारों की एक महीने की कमाई से महंगा है. ज़िला अस्पताल में मनोचिकित्सक हो भी, तो सप्ताह में दो दिन OPD चलती है. किसान कल्याण मंत्रालय की "मनसा" जैसी योजनाएँ कागज़ पर हैं — बजट आवंटित, अमल अधूरा.

पहुँच की खाई के पीछे का आंकड़ा
०.७५
भारत में हर १,००,००० लोगों पर मनोचिकित्सक. विश्व स्वास्थ्य संगठन कम से कम तीन की सिफारिश करता है.
Indian Journal of Psychiatry · 2022
~७०%
मानसिक स्वास्थ्य कार्यबल केवल २० महानगरों में केंद्रित है, जहाँ देश की लगभग ३०% आबादी रहती है.
NIMHANS कार्यबल अध्ययन
१२
प्रति दस लाख लोगों पर क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक. उच्च-आय देशों में यह औसत ५०० से अधिक है.
Lancet Psychiatry · 2021
हमारी चुप्पी कैसे यह पाइपलाइन बनाती है
1
दर्द शुरू होता है
चिंता, उदासी, घुस आने वाले विचार, थकान. सामान्य. उपचार योग्य. परिवार से छिपा.
2
परिवार देखने से मना करता है
"ये बस तनाव है." "तेरे पास खाना है, छत है, भविष्य है — उदास होने लायक क्या है." मरीज़ ठीक होने का अभिनय सीख लेता है.
3
जल्दी मदद का रास्ता बंद हो जाता है
छह महीने बीतते हैं. एक साल. उपचार योग्य स्थिति दीर्घकालिक हो जाती है. माँगने पर सज़ा मिली थी, इसलिए मरीज़ पूछना बंद कर देता है.
4
एक संकट मुद्दे पर बात करने को मजबूर करता है
आत्महत्या का प्रयास. मानसिक विघटन. हिंसक प्रसंग. वही परिवार जिसने डॉक्टर के पास जाने से इनकार किया था, अब इमरजेंसी वार्ड माँगता है.
5
सुर्ख़ी अपने आप लिखी जाती है
"परीक्षा के तनाव में विद्यार्थी की आत्महत्या." "वर्षों की घरेलू हिंसा के बाद पत्नी का शव मिला." देश दिखावटी अफ़सोस जताता है, फिर ब्राउज़र बंद कर देता है.

युवाओं का संकट.

भारत में १५ से २९ वर्ष के युवाओं में मृत्यु का पहला कारण आत्महत्या है.[3] यह एक आंकड़ा देश के युवाओं के बारे में सोच का तरीका ही बदल देता है. सड़क दुर्घटना नहीं. कैंसर नहीं. कमरे में, अकेले, वह खामोशी है.

२०२२ में ढाई लाख भारतीयों ने आत्महत्या की. उनमें से एक लाख से अधिक विद्यार्थी थे. वह उम्र जिसके पास फ़ोन सबसे अधिक हैं, इलाज की सबसे कम पहुँच है, और ज़िंदगी तय करने वाली एक परीक्षा में सफल होने का सबसे अधिक दबाव है.

जिन विद्यार्थियों को हम खो रहे हैं वे कमज़ोर नहीं हैं. वे वे हैं जिन्होंने सबसे लंबे समय तक अकेले बोझ उठाया — और एक भी बड़ा इंसान यह पूछने नहीं आया कि वह बोझ कितना भारी था.

हम उन्हें क्या सिखाते हैं

  • JEE, NEET, UPSC. तुम्हारी क़ीमत तुम्हारी रैंक है
  • तेरे पास एक ज़िंदगी है, बर्बाद मत कर
  • असली विद्यार्थी आठ घंटे नहीं सोते
  • संघर्ष चरित्र बनाता है, शिकायतें नहीं
  • लड़के नहीं रोते, लड़कियाँ नहीं चिड़तीं

हम कभी क्या नहीं सिखाते

  • भावना का नाम ज़ोर से बोलना
  • मदद माँगना कमज़ोरी नहीं, कौशल है
  • संकट में किसी दोस्त के पास चुपचाप कैसे बैठना है
  • एक परीक्षा में असफलता जीवन की असफलता नहीं
  • उनका शरीर और मन पहले उनका है

हम देश के सबसे अच्छे विद्यार्थियों को खो रहे हैं. किसी वायरस से नहीं. किसी युद्ध से नहीं. एक अंक तालिका पर लिखे उस नंबर से — जिसे उनकी ज़िंदगी तय नहीं करना चाहिए था.

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हिसाब.

भारत मानसिक स्वास्थ्य समस्या वाला देश नहीं है. यह संस्कृति समस्या के वेश में लिपटा जन स्वास्थ्य संकट वाला देश है. ये आंकड़े राय नहीं हैं — ये NCRB के शवों की गिनती हैं.

मानसिक बीमारी को मधुमेह या रक्तचाप की तरह एक चिकित्सीय स्थिति मानना सबसे सस्ता, सबसे तेज़, और सबसे स्पष्ट हस्तक्षेप है जो हमारे पास है. हम जानबूझकर इसे नहीं कर रहे. कार्यबल बनाने की लागत असली है. न बनाने की कीमत हर साल २,५०,००० मरे हुए भारतीय हैं — और आने वाला दशक इससे भी बुरा होगा.

२.३ लाख
२०२२ में भारतीयों ने आत्महत्या की — NCRB में दर्ज अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा. विद्यार्थी आत्महत्या दर पिछले दशक में हर साल बढ़ी है. हम सुर्ख़ियों को कल्पना नहीं कर रहे — वे सच हैं, और बदतर होती जा रही हैं.
NCRB · भारत में आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या 2022
मानसिक स्वास्थ्य सेवा वास्तव में क्या है
01
एक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था
अमीरों की विलासिता नहीं. हर ज़िले में एक मनोचिकित्सक, हर स्कूल में एक परामर्शदाता, उपयोग की जगह पर मुफ़्त.
02
एक साक्षरता अभियान
एक पीढ़ी को भावना का नाम लेना, संकट पहचानना, और मंदिर की जगह फ़ोन नंबर उठाना सिखाने वाला अभियान. रोकथाम अंतिम संस्कार से सस्ती है.
03
शर्म का सामूहिक विसर्जन
ऐसे परिवार, कक्षाएँ, और कार्यालय बनाना जहाँ "मैं ठीक नहीं हूँ" बोलने वाला व्यक्ति अपनी नौकरी, अपनी शादी, या रिश्तेदारों के सम्मान से न हाथ धोए.

या तो हम वह बातचीत करें जिसे हम सदी भर से टाल रहे हैं, या अख़बार में नाम पढ़ते रहें — इनमें से एक चुनना होगा.

सामने खड़ा सवाल
स्रोत व टिप्पणियाँ
[1]
निमहंस (NIMHANS) — भारत का राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16. १२ राज्यों में किसी भी मानसिक रुग्णता का भारित प्रसार १०.६% था. सामान्य मानसिक विकारों के लिए उपचार-अंतर मणिपुर में २८% से लेकर मध्य प्रदेश में ८३.६% तक था, राष्ट्रीय औसत ७०% से अधिक. २०१९ की समीक्षा में निष्कर्ष निकाला गया कि ८०% से अधिक लोगों को जिन्हें देखभाल की आवश्यकता थी वे नहीं मिली, संकोच और पहुँच की कमी को प्रमुख बाधाएँ बताया. द हिंदू, द वायर, और WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया कार्यालय ने इसकी रिपोर्टिंग की.
[2]
Indian Journal of Psychiatry (2022) और Lancet Psychiatry Commission on Global Mental Health (2021). भारत में १.४ अरब की आबादी पर लगभग ९,००० मनोचिकित्सक हैं, अर्थात् हर १,००,००० पर लगभग ०.७५. WHO की सिफारिश ३ प्रति १,००,००० है. क्लिनिकल मनोवैज्ञानिकों की संख्या भी उतनी ही कम — प्रति दस लाख लगभग १२, जबकि उच्च-आय वाले OECD देशों में यह ५०० से अधिक है. भौगोलिक वितरण बेहद असमान: लगभग ७०% मनोचिकित्सा पेशेवर २० शहरों में कार्यरत हैं.
[3]
National Crime Records Bureau — भारत में आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या 2022, और Institute for Health Metrics and Evaluation (IHME) Global Burden of Disease अध्ययन 2021. NCRB 2022 में भारत में २,३३,००० आत्महत्या के मामले दर्ज (कई शोधकर्ता इसे कम आंकड़ा मानते हैं; IHME का अनुमान २,५०,००० से अधिक है). १८-२९ आयु वर्ग सभी आत्महत्याओं का लगभग ३५% है. NCRB द्वारा अलग से ट्रैक की जाने वाली विद्यार्थी आत्महत्याएँ 2022 में १३,००० के पार पहुँच गईं — अब तक का सबसे ऊँचा आंकड़ा. १५-२९ वर्ष के भारतीयों के लिए मृत्यु का पहला कारण आत्महत्या है, सड़क दुर्घटनाओं और क्षय रोग से आगे.
[4]
iCall (TISS) हेल्पलाइन डेटा, 2018-2023, और Vandrevala Foundation वार्षिक रिपोर्ट. iCall ने 2023 में ६०,००० से अधिक परामर्श सत्र आयोजित किए. शीर्ष तीन शिकायतें: चिंता, अवसाद, और रिश्ते या पारिवारिक संघर्ष. ७०% से अधिक कॉल करने वाले १८ से ३० वर्ष के हैं. वंद्रेवाला फाउंडेशन हेल्पलाइन (1-800-2333-330) कई भारतीय भाषाओं में २४/७ कार्यरत है — अंग्रेज़ी-भाषी महानगरों से परे माँग को दर्शाता है. 2020 के बाद से दोनों हेल्पलाइनों पर कॉल की मात्रा लगातार बढ़ी है.
[5]
World Health Organization — Mental Health Atlas 2020 और WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट. भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय कुल स्वास्थ्य बजट का लगभग ०.०५% है, जबकि वैश्विक मध्यमान २.१% है. WHO ने बार-बार दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र — जहाँ भारत आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा रखता है — को निवेश की तुलना में वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य भार का अनुपातहीन हिस्सा वहन करने वाला बताया है.
[6]
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति (2014) और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017. भारत ने तीन दशकों बाद 2017 के अधिनियम के साथ अपना पहला व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कानून लागू किया — जिसने आत्महत्या को गैर-आपराधिक बनाया, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच के अधिकार की पुष्टि की, और राज्य की सेवाएँ प्रदान करने की ज़िम्मेदारी तय की. अधिनियम लगभग एक दशक से लागू है. ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वयन विरल है, विशेषकर प्राथमिक देखभाल में, और कार्यबल विस्तार के नीति-लक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं.